शामें.


कितनी ही शाम सिर्फ इसी तरह गुजर जाती है, और इनके सदियों में तब्दील होते देर नहीं लगती, जबकि हम दीवार के टँगे कैलेंडर पर सिर्फ सुबह से शाम ही हो रहे होते है ।

शामें हमे बताती हैं कि हर शाम पहली शाम से अलग होती है, अभी से बदलकर कल ये कुछ और हो जाएगी ।

लेकिन हम नही बदलते, हम सिर्फ गुजरते हैं, एक शाम से दूसरी शाम के बीच ज्यों के त्यों, और यही गुजर जाना ही हमारा भीतरी फासिज़्म है। 
शाम डूब जाती है तो भरम रखना चाहिए कि हम डूब गए और सुबह चढ़े तो भरम होना चाहिए कि हम फिरसे जिंदा हो गए हैं।

शामें इसी कशमकश का नाम होती हैं।

देखो , तुम अभी तक मेरे कितने करीब हो, इस शाम के डूबने और उतरने के बीच जितना मैं खुदके। 
मेरा होना और डूब जाने जितना भरम से भी कहीं आगे तुम मुझमे शाम की तरह बस चुकी हो। 

अभी तुम मेरे हिस्से का आसमान मेरे लिए इतना ही स्याह रखना कुछ सितारों के बीच ।

में तुम में इन्ही शामों की तरह गुजरता रहूंगा। 
तुम मेरी हर शाम हो, इसके डूबने से लौटने तक , इनके बदल जाने के बीच वही तुम और वही मैं ।

‘Oh, I wouldn’t mind, Hazel Grace. It would be a privilege to have my heart broken by you.’

Post courtesy: Gustakhinama गुस्ताख़ीनामा (Facebook).
Picture location: Mumbai, India.

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